Sunday, 25 September 2022

नहीं कटवाए गए थे ताज बनाने वालों के ह‍ाथ ------ Mahendra Neh



Mahendra Neh

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नहीं कटवाए गए थे ताज बनाने वालों के ह‍ाथ 

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- ऐसी अफवाह है कि शाहजहां ने ताज बनाने वाले 20 हजार मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे।

- इसके पीछे वजह बताई जाती है कि शाहजहां चाहता था कि दोबरा कोई ताज जैसी स्माारक न बनवा सके।

- लेकिन इतिहासकार राजकिशोर के अनुसार, शाहजहां ने ताज के निर्माण के बाद कारीगरोंं से आजीवन काम न करने का वादा लिया था।

- इसके बदले कारीगरों को जिंदगी भर वेतन देने का वादा किया गया था।

- कारीगरों के हाथों के हुनर का काम करने से रोक देने को दूसरे शब्दों  में हाथ काटना कहा गया।

- शाहजहां ने ताज के पास 400 साले पहले मजदूरों के लिए ताजगंज नाम से बस्तीा बसा दी थी।

- ताज निर्माण के समय मजदूर और आर्किटेक्टस यहीं रहा करते थे।

- इनमें से कुछ मजदूरों और आर्के टिक्टर को ताज के साथ-साथ दिल्ली  के लाल किला निर्माण में भी लगाया गया था।

- अब भी यहां उन मजदूरों के वंशज यहां रह रहे हैं। यहां के निवासी ताहिर उद्दीन ताहिर का कहना है कि उन्हेंम गर्व है कि उनके पूर्वजों ने ताजमहल बनाने में हिस्सा  लिया।

- हाथ काटने की अफवाह में जरा भी सच्चांई नहीं है।

ताज का नक्शाक बनाने वाले को मिलती थी 1 हजार रु सैलरी

- शाहजहां को इमारतें बनवाने का शौक था। ताज पहली इमारत थी, जिसका निर्माण उन्हों ने कराया।

- दूरदराज से तमाम बेहतरीन कारीगर पैसों के लालच में आगरा में आकर बस गए थे।

- भारत ही नहीं अरब पर्सिया और तुर्की से वास्तु विदों, मिर्ताणकर्ताओं और पच्चीहकारी के कलाकारों को बुलाया गया था।

- ताज का नक्शा  बहुतों ने बनाया, लेकिन शाहजहां को उस्तारद ईसा आफदी का डिजाइन पसंद आया।

- जबकि पत्थ्रों पर शब्दं उकेरने का काम अमानत खान शिरजी को सौंपा गया।

- शाहजहां इन दोनों को काम के बदले 1 हजार रुपए प्रतिमाह सैलरी देता था, जोकि उस समय बहुत ज्याादा थी।

- आफदी के साथ चार अन्यक लोगों को नक्शेह के काम के लिए समान वेतन पर रखा गया था।

तुर्की के कारीगर ने बनाया था ताज का गुंबद

- तुर्की के कारीगर इस्माइल खान को ताज का गुंबद बनाने की जिम्मेमदारी मिली थी।

- इसके लिए उन्हें 500 रुपए प्रति महीने सैलरी मिलती थी।

- वहीं, 200 रुपए महीने पर लाहौर के कासिम खान ने कलश बनाने की जिम्मेदारी संभाली।

- मनोहर लाल मन्नू को 500 रुपए प्रति महीने में पच्चीकारी का काम सौंपा गया था।

- गुम्बद तैयार करने की जिम्मेदारी तुर्की के कारीगर इस्माइल खान को मिली और इसके लिए उन्हें 500 रुपये महीना पर रखा गया।

- 200 रुपए महीने पर लाहौर अब पकिस्तान के कासिम खान ने कलश बनाने की जिम्मेदारी संभाली।

- मनोहर लाल मन्नू लाल मोहन लाल को 500 रुपये माह में पच्ची कारी का काम सौपा गया।

 शाहजहां ने कारीगरों के लिए बसाई थी ताजगंज बस्ती

Friday, 23 September 2022

बेरोजगारी के आज के दौर में ------ विजय राजबली माथुर

 बेरोजगारी के आज के दौर में 47 वर्ष पूर्व आज ही के दिन अर्थात 22 सितंबर 1975 को लगभग 90 दिन  की बेरोजगारी के बाद रोजगार की पुनर्प्राप्ति की घटना स्मृति पटल पर घूम गई।

25 जून 1975 को इमरजेंसी घोषित हुई थी और उसी की आड़ लेकर 29 जून को सारू स्मेल्टिंग,मेरठ से मेरी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं और भी बहुतेरे लोगों के साथ ही।लिहाजा माता पिता के पास आगरा आ गया था और नौकरी की तलाश में जुट गया था।

निर्माणाधीन आईटीसी मोघुल ओबेरॉय में डाक से अर्जी भेज दी थी।

16 सितंबर को 18 तारीख को लिखित परीक्षा देने का काल लेटर डाक से प्राप्त हुआ , 20 सितंबर को साक्षात्कार हुआ और ज्वाइन करने को कहा गया।मैंने सोमवार 22 सितंबर 1975 को ज्वाइन कर लिया।

लिखित परीक्षा में 20 उम्मीदवार थे जिनमें से 4 को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था एक मैं,दूसरे विनोद श्रीवास्तव,तीसरे सुदीप्तो मित्र,चौथे एक सक्सेना साहब थे।पोस्ट दो ही थीं।

मैंने 22 सितंबर को जबकि सुदीप्तो मित्र ने 01 अक्तूबर को ज्वाइन कर लिया था। सक्सेना साहब फिर नहीं मिले जबकि विनोद श्रीवास्तव थोड़े थोड़े अंतराल पर हम से मिलते और उनको भी एडजस्ट करवाने को कहते रहे।

चूंकि मित्र साहब स्टोर में थे और मैं अकाउंट्स में लिहाजा दोनों से ठेकेदार ,सप्लायर्स का संपर्क था।मित्र ज्यादा बोलने और मजाक पसंद थे और मैं चुपचाप गंभीरता से काम करने वाला।अतः मैन कांट्रेक्टर  जी एस लूथरा साहब के बेटे जगमोहन लूथरा साहब ने मुझ से अपने जैसा काम करने वाला एक लड़का रेफर करने को कहा मैंने विनोद श्रीवास्तव को बुलवा कर उनसे भेंट करवा दी।उन्होंने उनको तत्काल ज्वाइन करवा दिया।

इमरजेंसी में 29 जून से 21 सितंबर तक की बेरोजगारी में सिर के बाल तक झड़ गए थे ऐसा होता है बेरोजगारी का आघात इसलिए मैंने विनोद श्रीवास्तव को नियुक्त करवा कर उनका भी आघात कम करवा दिया।अब तो आफिशियली वह दिन में कई कई बार मुलाकात करते थे।राजनीतिक चर्चा भी हो जाती थी मैं इंदिरा गांधी का विरोध करता था वह तब कांग्रेस का समर्थन करते थे।

लूथरा साहब के एक विश्वस्त सुपरवाइजर थे अमर सिंह राठौर जो बीएसएफ के रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर थे उनको ज्योतिष की गहन जानकारी थी विनोद की उनसे खूब पटती थिएं तब मैं ज्योतिष  विरोधी था विनोद ने उनसे मेरा हाथ देख कर बताने को कहा मैं हाथ दिखाने को अनिच्छुक था।विनोद जबरदस्ती लगभग खींचते हुए ही उनके पास ले गए थे।उनसे बोले इनको नहीं उनको अर्थात विनोद को बताएं कि इनका क्या भविष्य है

अमर सिंह ने  विनोद को मेरे बारे में जो बताया उसकी मैने उपेक्षा  कर दी जिस पर अमर सिंह का कहना था आज यह मेरी खिल्ली उड़ा रहे हैं एक दिन यही हमारी तरह सबको उनके भविष्य के प्रति आगाह करते हुए तुमको मिलेंगे।

अमर सिंह के अनुसार 26 वर्ष की उम्र में मेरा अपना मकान होना था तब उम्र 23 वर्ष और वेतन रु 275 मासिक था अतः मुझे उपहास करना ही था कि कैसे संभव होगा?उनका कहना कैसे होगा वह नहीं जानते लेकिन ऐसा ही होगा और यह भी कि 42 वर्ष की उम्र में वास्तविक रूप से अपना होगा जबकि उसमे रहोगे 26 की उम्र से ही।

एक और सहकर्मी ने 1977  में हाउसिंग बोर्ड के कुछ मकान बुकिंग होने की सूचना दी उन्होंने खुद और एक नेवी के रिटायर्ड साहब ने भी फार्म भरा था उनके पास पैसे थे जबकि मेरे और उन  सहकर्मी के पास आभाव था।

लेकिन सारू स्मेल्टिंग,मेरठ में मेरे डिपोजिट के 3000रु थे जिनको वे रिलीज नहीं कर रहे थे उनको लीगल नोटिस दिया तो फटाफट भेज दिए। उन रुपयों का डीडी 27 मार्च 1977 को जब मोरार जी देसाई पी एम की शपथ ग्रहण कर रहे थे सेंट्रल बैंक,आगरा कैंट से बनवा रहा था।

03 अप्रैल 1978 को लखनऊ से जारी एलाटमेंट लेटर मिला और 10 अप्रैल 1978 को रु 290 की पहली किश्त जमा कर दी तब तक वेतन बढ़ कर रु 500 मासिक हो चुका था।तब उम्र 26 वर्ष ही थी अक्टूबर तक  कमला नगर ,आगरा में हायर परचेज के अपने मकान में आ भी गए थे तब तक लूथरा साहब ने दिल्ली में अमर सिंह को अमर ज्योतिष कार्यालय  अपने कार्यालय के साथ खुलवा दिया था।वहां पत्र भेज कर अमर सिंह जी को साभार सूचना दी जिस पर वह बेहद खुश भी हुए और आगरा आकर हमसे होटल मुगल में मिले भी।15 वर्ष की किश्त जमा होने पर भी रिश्वतखोर अडंगा लगा रहे थे ,में cpi आगरा का जिला कोषाध्यक्ष था गवर्नर मोती लाल बोरा को पत्र भेजा उनके हस्तक्षेप से रजिस्ट्री हुई तब उम्र 42 वर्ष ही हो गई थी।

विनोद श्रीवास्तव को हमने होटल मुगल में ही जाब  दिला दिया और लूथरा साहब से रिलीव करवा दिया।बाद में विनोद केनरा बैंक में तथा सुदीप्तो मित्र बैंक आफ बड़ौदा में चले गए।

अमर सिंह जी ने 1975 में कुल 13 वर्ष की ही नौकरी बताई थी और बाद में दिमाग से खाने की बात कही थी। उस वक्त हास्यास्पद लगा था।जनवरी 1985 में होटल मुगल से सेवाएं समाप्त हो गईं इस प्रकार 1972 से 1985 तक 13 वर्ष की ही नौकरी करने की बात भी सही  ही रही।

हालांकि 1985 से 2000 तक 15 वर्ष हींग की मंडी आगरा के जूता बाजार में विभिन्न दुकानों में ट्यूशन बेसिस पर अकाउंट्स जाब किया लेकिन अन रिकार्ड  सर्विस थी दिमाग का ही काम था।

2000 में बाबू जी साहब अर्थात श्वसुर साहबया स्व बिलासपती सहाय ) के परामर्श पर ज्योतिष का कार्य अपना लिया और उनकी ही पुत्री के नाम पर सरला बाग,आगरा में पूनम ज्योतिष कार्यालय भी खोला था।

चंद्र मोहन शेरी,राकेश त्विकले,विराज माथुर और उनके मौसेरे भाई मनोज माथुर आदि ने मुझसे परामर्श भी लिया और हवन भी करवाया।अन्य बिरादरी के लोगों में ब्राह्मण प्रोफेसर,अधिकारी भी शामिल रहे।डाक्टर अजीत माथुर उनकी माता जी,बहन और बहनोई भी मुझसे परामर्श लेने वालों में रहे हैं।

अब लखनऊ में सक्रिय नहीं हूं केवल परिचितों और रिश्तेदारों को परामर्श दे रहा हूं।

Wednesday, 21 September 2022

चांदी के वर्क से व्यंजनों की खूबसूरत सजावट ------ डाक्टर कृपा शंकर माथुर

22 सितंबर 1977 के नवजीवन,लखनऊ के पृष्ठ 04 पर प्रकाशित लेख।मामाजी की पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति में  ===================== 



चांदी के वर्क से व्यंजनों की खूबसूरत सजावट

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'नवजीवन’ के विशेष अनुरोध पर डाक्टर कृपा शंकर माथुर ने लखनऊ की दस्तकारियों के संबंध में ये लेख लिखना स्वीकार किया था। यह लेख माला अभी अधूरी है, डाक्टर माथुर की मृत्यु के कारणवश अधूरी ही रह जाएगी, यह लेख इस शृंखला में अंतिम है। 

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अगर आपसे पूछा जाए कि आप सोना या चांदी खाना पसंद करेंगे, तो शायद आप इसे मजाक समझें लेकिन लखनऊ में और उत्तर भारत के अधिकांश बड़े शहरों में कम से कम चांदी वर्क के रूप में काफी खाई जाती है। हमारे मुअज़्जिज मेहमान युरोपियन और अमरीकन अक्सर मिठाई या पलाव पर लगे वर्क को हटाकर ही खाना पसंद करते हैं, लेकिन हम हिन्दुस्तानी चांदी के वर्क को बड़े शौक से खाते हैं। 

चांदी के वर्क का इस्तेमाल दो वजहों से किया जाता है। एक तो खाने की सजावट के लिये और दूसरे ताकत के लिये। मरीजों को फल के मुरब्बे के साथ चांदी का वर्क अक्सर हकीम लोग खाने को बताते हैं। 

कहा जाता है कि चांदी के वर्क को हिकमत में इस्तेमाल करने का ख्याल हकीम लुकमान के दिमाग में आया, सोने-चांदी मोती के कुशते तो दवाओं में दिये ही जाते हैं और दिये जाते रहे हैं, लेकिन चांदी के वर्क का इस्तेमाल लगता है कि यूनान और मुसलमानों की भारत को देन  है। चांदी के चौकोर टुकड़े को हथौड़ी से कूट-कूट कर कागज़ से भी पतला वर्क बनाना, इतना पतला कि वह खाने की चीज के साथ बगैर हलक में अटके खाया जा सके। कहते हैं कि यह विख्यात हकीम लुकमान की ही ईजाद थी। जिनकी वह ख्याति है कि मौत और बहम के अलावा हर चीज का इलाज उनके पास मौजूद था। 

लखनऊ के बाजारों में मिठाई अगर बगैर चांदी के वर्क के बने  तो बेचने वाला और खरीदने वाला दोनों देहाती कहे जाएंगे। त्योहार और खासकर ईद के मुबारक मौके पर शीरीनी और सिवई की सजावट चांदी के वर्क से कि जाती है। शादी ब्याह के मौके पर नारियल, सुपारी और बताशे को  भी चांदी के वर्क से मढ़ा जाता है। यह देखने में भी अच्छा लगता है और शुभ भी माना जाता है। क्योंकि चांदी हिंदुस्तान के सभी बाशिंदों में पवित्र और शुभ मानी जाती है। 

लखनऊ के पुराने शहर में चांदी के वर्क बनाने के काम में चार सौ के करीब कारीगर लगे हैं। यह ज्यादातर मुसलमान हैं, जो चौक और उसके आस-पास की गलियों में छोटी-छोटी सीलन भरी अंधेरी दुकानों में दिन भर बैठे हुए वर्क कूटते रहते हैं।ठक-ठक की आवाज से जो पत्थर की निहाई पर लोहे की हथौड़ी से कूटने पर पैदा होती है, गलियाँ गूँजती रहती हैं। 

इन्हीं में से एक कारीगर मोहम्मद आरिफ़ से हमने बातचीत की। इनके घर से पाँच-छह पुश्तों से वर्क बनाने का काम होता है। चांदी के आधा इंच वर्गाकार टुकड़ों को एक झिल्ली के खोल में रखकर पत्थर की निहाई पर और लोहे की हथौड़ी से कूटकर वर्क तैयार करते हैं। डेढ़ घंटे में कोई डेढ़ सौ वर्कों की गड्डी तैयार हो जाती है, लेकिन यह काम हर किसी के बस का नहीं है। हथौड़ी चलाना भी एक कला है और इसके सीखने में एक साल से कुछ अधिक समय लग जाता है। इसकी विशेषता यह है कि वर्क हर तरफ बराबर से पतला हो,चौकोर हो,और बीच से फटे नहीं। 

वर्क बनाने वाले कारीगर को रोजी तो कोई खास नहीं मिलती, पर यह जरूर है कि न तो कारीगर और न ही उसका बनाया हुआ सामान बेकार रहता  है। मार्केट सर्वे से पता चलता है कि चांदी के वर्क की खपत बढ़ गई है और अब यह माल देहातों में भी इस्तेमाल में आने लगा है। 

ठक…. ठक…. ठक। घड़ी की सुई जैसी नियमितता से हथौड़ी गिरती है और करीब डेढ़ घंटे में 150 वर्क तैयार।


Sunday, 13 June 2021

27 वीं पुण्यतिथि पर बाबूजी का स्मरण

 



बाबूजी को यह संसार छोड़े हुए आज 26 वर्ष पूर्ण हो गए हैं।सीमाब अकबराबादी  की  उपरोक्त नज़्म बाबूजी को पसंद आई होगी और उन्होंने इसे उर्दू  एवं देवनागरी दोनों लिपियों में लिपिबद्ध करके रखा था। उनका हस्तलिखित पर्चा कल ही पुरानी फ़ाइलों से प्राप्त हुआ है। अतः इसे उनके स्मृति दिवस पर उनको श्रद्धावत नमन सहित प्रकाशित किया जा रहा है। 

Wednesday, 31 March 2021

राष्ट्र संघ एक बंधुआ विश्व संस्था ------ बी डी एस गौतम

 राष्ट्र संघ एक बंधुआ विश्व संस्था


संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव पेरेज द कुइयार कह रहे हैं कि इराक के विरुद्ध अमेरिका और उसके मित्र देशों की कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यवाही नहीं है, पर जॉन मेजर से लेकर जॉर्ज बुश तक अमेरिकी नेतृत्व में इराक के विरुद्ध लड़े जा रहे युद्ध को इराक से संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को मनवाने के लिए की जा रही कार्यवाही बनाते हैं। यह कैसा विरोधाभास है कि मित्र देश संयुक्त राष्ट्र संघ की हैसियत बनाए रखने के लिए इराक पर हमला बोल देते हैं और महासचिव को तब तक कोई सूचना ही नहीं रहती। कुइयार ने पिछले दिनों एक पश्चिमी अखबार को दिए गए अपने इंटरव्यू में बताया था कि युद्ध शुरू होने के 1 घंटे बाद मुझे इसकी सूचना मिली। कुइयार ने यह भी बताया अमेरिका ने जिस समय इराक पर हमला बोला उससे कुछ ही घंटे बाद वे खाड़ी संकट के शांति पूर्वक हल के लिए एक और राजनैतिक प्रयास कर रहे थे। मगर अमेरिका ने उनसे यह मौका छीन लिया। पेरेज द कुइयार के इस कथन से साफ-साफ जाहिर होता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ नामक जिस संस्था को पिछले 45 सालों से विश्व की शांति और स्वतंत्रता की रक्षक माना जाता है वह निरा एक ढोंग है। हालांकि इतिहास में यह ढोंग पहले भी कई बार प्रकट हो चुका है, मगर वर्तमान खाड़ी युद्ध ने पूरी तरह साबित कर दिया है की यह संस्था अमेरिका की बंधुआ है।


राष्ट्र संघ की कोख से जन्मी संयुक्त राष्ट्र संघ का 45 वर्षीय इतिहास गवाह है कि विश्व संस्था के नाम पर यह अपनी ताकत का इस्तेमाल अमेरिका की दादागिरी को नैतिक सर्टिफिकेट प्रदान करने में करती रही है और यह आज से नहीं बल्कि तब से जारी है जब हैरी एस ट्रूमैन के नेतृत्व में अमेरिका दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया में अपनी आर्थिक और सैनिक दादागिरी जमाने का इरादा बना चुका था। अमेरिका के इस इरादे की पुष्टि और  संयुक्त राष्ट्र संघ के निष्पक्षता की पोल तो वास्तव में 27 जून 1950 को ही खुल गई थी जब राष्ट्रपति ट्रूमैन ने अपनी हवाई सेना और समुद्री बेड़े को उत्तर कोरिया के खिलाफ तुरंत कार्यवाही का आदेश दिया था।


संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में  कहा गया था  कि दो देशों के आपसी झगड़े में तीसरा देश संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बाद ही कूदेगा, मगर अमेरिका ने इस तरह के किसी कानून के पालन को जरूरी नहीं समझा। 25 जून 1950 को उत्तरी और दक्षिणी कोरिया दोनों के बीच लड़ाई छिड़ गई। अमेरिका दूसरे ही दिन इस लड़ाई में हस्तक्षेप हेतु उतर आया जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हस्तक्षेप को कानूनी जामा 5 महीने बाद यानी नवंबर 1950 में जाकर पहनाया। यही नहीं नवंबर 1950 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने जब उत्तरी कोरिया के खिलाफ बल प्रयोग का प्रस्ताव पास किया तो उसी अमेरिकी सैनिक कमांडर मैकाथेर को संयुक्त सेनाओं का कमांडर जनरल नियुक्त कर दिया जो 5 महीने पहले से ही अमेरिकी कार्यवाही का नेतृत्व कर रहा था।


वर्तमान उदाहरण को ही देख लीजिए अपने आप पता चल जाएगा कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र का आदेश मान रहा है या संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का। 5 अगस्त 1990 को अमेरिकी कांग्रेस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाता है, 16 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र इराक के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध पास कर देता है, 16 अगस्त को अमेरिकी नौसेना आर्थिक प्रतिबंध के बहाने खाड़ी में अपना मोर्चा जमाती है और नवंबर के आखिरी सप्ताह में यू एन ओ इराक के खिलाफ बल प्रयोग का प्रस्ताव पास कर देता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि नवंबर तक अमेरिका इराक के खिलाफ लगातार अपने मोर्चे सजाने में लगा रहा। 10हजार  से शुरुआत करके 3लाख  सैनिक तक इस बीच उसने खाड़ी में जमा कर दिए। स्पष्ट है यू एन ओ इराक के खिलाफ सितंबर में भी बल प्रयोग का प्रस्ताव पास कर सकता था यदि अमेरिका तुरंत लड़ाई के लिए तैयार होता।


कुवैत पर इराक के आक्रमण के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका जिस तरह से सक्रिय हुए वह विश्व की शांति और स्वतंत्रता के लिए मिसाल बन सकता था बशर्ते दोनों के इरादे नेक होते। मगर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों की तत्परता तब संदिग्ध हो जाती है जब इनके इतिहास की पड़ताल की जाए। उदाहरणार्थ 14 मई 1948 को जब पैलेस्टाइन से ब्रिटिश कमिश्नर राष्ट्र संघ के मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई जिम्मेदारियों को छोड़कर भाग आया तब संयुक्त राष्ट्र संघ या अमेरिका ने पैलेस्टाइन में शांति बनाए रखने के लिए सेना क्यों नहीं भेजी? तब तक तो अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध जैसी भी कोई बात नहीं थी। यही नहीं जब ब्रिटिश कमिश्नर के भागने के बाद यहूदियों ने हिंसा के बल पर जिस 'इस्त्राइल' नामक स्वतंत्र राष्ट्र की घोषणा की उसे मान्यता देने वाला भी अमेरिका दुनिया का पहला राष्ट्र था। यह सब कोई अकस्मात नहीं हुआ था बल्कि हैरी एस ट्रूमैन द्वारा चुनाव पूर्व यहूदियों को दिए गए उनके स्वतंत्र राष्ट्र की वायदे के मुताबिक हुआ था।


संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका की पोल 1965-66 में भी एक बार खुली थी जब यू एन ओ की निष्ठा के प्रति दुहाई देने वाला अमेरिका उसके प्रस्ताव नंबर 2232 को खुल्लम खुल्ला चुनौती देते हुए दियागा गार्सिया द्वीप को इंग्लैंड के साथ हड़प उसे दोनों ने अपना सामरिक अड्डा बना लिया। संयुक्त राष्ट्र संघ शाब्दिक निंदा के अलावा कुछ नहीं कर पाया।


संयुक्त राष्ट्र संघ के 20-21वें अधिवेशन में प्रस्ताव नंबर 2232 पास किया गया था। इस प्रस्ताव में कहां गया था कि औपनिवेशिक इलाकों की क्षेत्रीय अखंडता का आंशिक या पूर्ण उल्लंघन संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र तथा उसकी नियमावली के प्रस्ताव 1514(पराधीन देशों और जनगण को स्वतंत्रता प्रदान किया जाना) का उल्लंघन होगा। मगर ब्रिटेन और अमेरिका इस प्रस्ताव को ठेंगा दिखाते हुए 30 किलोमीटर वर्ग वाले मॉरीशस के द्वीप डियागो गार्सिया को हिंद महासागर में अपने संयुक्त हितों का सामरिक अड्डा बना लिया। बाद में ब्रिटेन ने इसे सन 2016 तक के लिए अमेरिका को ही किराए पर दे दिया। 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिकी जंगी जहाज ‘इंटरप्राइज’ यहीं से चलकर बंगाल की खाड़ी पहुंचा था। वर्तमान खाड़ी युद्ध में कहर ढा रहे अमेरिका के बमवर्षक बी 52 यहीं से गए हैं।


ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र संघ कभी विश्व कल्याण की संस्था ही नहीं रही। इसके उद्देश्य के मूल में सदैव अमेरिका तथा उसके साथ ही देशों का हित ही रहा है। वैसे यह स्वाभाविक भी है क्योंकि यह संस्था जिस लीग ऑफ नेशन नामक विश्व संस्था की कोख से निकली थी वह अमेरिकी राष्ट्र विल्सन की शांति थ्योरी पर आधारित है। यह बात अलग है कि तत्कालीन अमेरिकी संसद इतनी भी लिबरल नहीं थी कि वह लीग ऑफ नेशन को स्वीकार कर सकती। लीग ऑफ नेशन के बावजूद दूसरा विश्व युद्ध हो गया तो विजेता देश पुनः 1944 में वाशिंगटन के डंबरटन ओक्स नामक स्थान पर इकट्ठा हुए। जिस तरह पहले विश्व युद्ध के बाद शांति का ठेका विजयी राष्ट्रों(और उनमें भी सिर्फ अमेरिका) को मिला था उसी तरह इस बार भी शांति का ठेका विजयी देशों  ने अपने पास रखा। अगर समझा जाए तो इस विश्व संस्था का उदय ही मित्र देशों खासकर अमेरिका की मर्जी को संविधान बनाने के लिए हुआ। इसलिए इस संस्था से विश्व शांति और समानता की आशा करना ही बेमानी है। अगर विजेता देश सचमुच द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ईमानदारी से विश्व शांति के पक्षधर होते तो इस शांति योजना की रचना में शेष देशों को भी( खासकर पराजित) शामिल करते और तब इसका स्वरूप ही कुछ और होता। सच तो यह है कि अगर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व अमेरिका और सोवियत संघ नामक दो खेमों में न बंट जाता या अमेरिका के समानांतर सोवियत संघ न खड़ा होता तो अमेरिका और उसके साथी देश इस तथाकथित विश्व संस्था के जरिए भूषण का ऐसा खेल खेलते 18वीं -19वीं शताब्दी के ब्रिटिश सैन्य साम्राज्यवाद को भी मात कर देते। संभवत इसी वास्तविकता को ध्यान में रखकर सोवियत संघ ने अमेरिका के कोरिया हस्तक्षेप के बाद सुरक्षा परिषद को मान्यता प्रदान कर उसका बकायदा स्थाई सदस्य बन गया।


सोवियत संघ और चीन की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य बनते ही यह विश्व संस्था इस कदर नाकारा हो गई थी कि इसमें कोई मसला ही नहीं हल हुआ यह सिर्फ राजनेताओं के लिए पिकनिक स्पॉट बन कर रह गई।


अगर लॉर्ड निस्टर के शब्दों में कहा जाए तो यू एन ओ उन प्रिफेक्टरों की तरह है जो छोटे बच्चों को अनुशासन में रखना चाहते हैं परंतु स्वयं उन नियमों से जिनसे वे शासन करना चाहते हैं, बरी रहना चाहते हैं। इसलिए समय आ गया है इस कठपुतली विश्व संस्था को या तो खत्म कर देना चाहिए या फिर इसे सही अर्थों में विश्व संस्था बनाने के लिए इसकी पूरे ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन करने चाहिए।


बी डी एस गौतम 



Friday, 26 March 2021

चांदी के वर्क से व्यंजनों की खूबसूरत सजावट ------ डाक्टर कृपा शंकर माथुर

 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के भूतपूर्व सदस्य एवं लखनऊ विश्वविद्यालय में मानव विज्ञान विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉक्टर कृपा शंकर माथुर साहब मेरे पिता जी (विजय राजबली माथुर ) के मामा जी थे और उनका विशेष स्नेह सदा ही पिता जी पर रहा। 48 वर्ष की आयु में 21 सितंबर 1977 को उनके निधन का समाचार एवं चांदी के वर्क पर आधारित उनकी लेखमाला ( जो अपूर्ण रह गई ) का क्रमिक भाग 22 सितंबर 1977 के नवजीवन में पृष्ठ -5 पर प्रकाशित हुआ था जो संग्रह की दृष्टि से यहाँ प्रस्तुत है------ यशवंत राजबली माथुर
चांदी के वर्क से व्यंजनों की खूबसूरत सजावट
नवजीवन’ के विशेष अनुरोध पर डाक्टर कृपा शंकर माथुर ने लखनऊ की दस्तकारियों के संबंध में ये लेख लिखना स्वीकार किया था। यह लेख माला अभी अधूरी है, डाक्टर माथुर की मृत्यु के कारणवश अधूरी ही रह जाएगी, यह लेख इस शृंखला में अंतिम है। 

अगर आप से पूछा जाए कि आप सोना या चांदी खाना पसंद करेंगे, तो शायद आप इसे मजाक समझें लेकिन लखनऊ में और उत्तर भारत के अधिकांश बड़े शहरों में कम से कम चांदी वर्क के रूप में काफी खाई जाती है। हमारे मुअज़्जिज मेहमान युरोपियन और अमरीकन अक्सर मिठाई या पलाव पर लगे वर्क को हटाकर ही खाना पसंद करते हैं, लेकिन हम हिन्दुस्तानी चांदी के वर्क को बड़े शौक से खाते हैं। 

चांदी के वर्क का इस्तेमाल दो वजहों से किया जाता है। एक तो खाने की सजावट के लिये और दूसरे ताकत के लिये। मरीजों को फल के मुरब्बे के साथ चांदी का वर्क अक्सर हकीम लोग खाने को बताते हैं। 

कहा जाता है कि चांदी के वर्क को हिकमत में इस्तेमाल करने का ख्याल हकीम लुकमान के दिमाग में आया, सोने-चांदी मोती के कुशते तो दवाओं में दिये ही जाते हैं और दिये जाते रहे हैं, लेकिन चांदी के वर्क का इस्तेमाल लगता है कि यूनान और मुसलमानों की भारत को देन  है। चांदी के चौकोर टुकड़े को हथौड़ी से कूट-कूट कर कागज़ से भी पतला वर्क बनाना, इतना पतला कि वह खाने की चीज के साथ बगैर हलक में अटके खाया जा सके। कहते हैं कि यह विख्यात हकीम लुकमान की ही ईजाद थी। जिनकी वह ख्याति है कि मौत और बहम के अलावा हर चीज का इलाज उनके पास मौजूद था। 

लखनऊ के बाजारों में मिठाई अगर बगैर चांदी के वर्क के बने  तो बेचने वाला और खरीदने वाला दोनों देहाती कहे जाएंगे। त्योहार और खासकर ईद के मुबारक मौके पर शीरीनी और सिवई की सजावट चांदी के वर्क से कि जाती है। शादी ब्याह के मौके पर नारियल, सुपारी और बताशे को  भी चांदी के वर्क से मढ़ा जाता है। यह देखने में भी अच्छा लगता है और शुभ भी माना जाता है। क्योंकि चांदी हिंदुस्तान के सभी बाशिंदों में पवित्र और शुभ मानी जाती है। 

लखनऊ के पुराने शहर में चांदी के वर्क बनाने के काम में चार सौ के करीब कारीगर लगे हैं। यह ज्यादातर मुसलमान हैं, जो चौक और उसके आस-पास की गलियों में छोटी-छोटी सीलन भरी अंधेरी दुकानों में दिन भर बैठे हुए वर्क कूटते रहते हैं।ठक-ठक की आवाज से जो पत्थर की निहाई पर लोहे की हथौड़ी से कूटने पर पैदा होती है, गलियाँ गूँजती रहती हैं। 

इन्हीं में से एक कारीगर मोहम्मद आरिफ़ से हमने बातचीत की। इनके घर से पाँच-छह पुश्तों से वर्क बनाने का काम होता है। चांदी के आधा इंच वर्गाकार टुकड़ों को एक झिल्ली के खोल में रखकर पत्थर की निहाई पर और लोहे की हथौड़ी से कूटकर वर्क तैयार करते हैं। डेढ़ घंटे में कोई डेढ़ सौ वर्कों की गड्डी तैयार हो जाती है, लेकिन यह काम हर किसी के बस का नहीं है। हथौड़ी चलाना भी एक कला है और इसके सीखने में एक साल से कुछ अधिक समय लग जाता है। इसकी विशेषता यह है कि वर्क हर तरफ बराबर से पतला हो,चौकोर हो,और बीच से फटे नहीं। 

वर्क बनाने वाले कारीगर को रोजी तो कोई खास नहीं मिलती, पर यह जरूर है कि न तो कारीगर और न ही उसका बनाया हुआ सामान बेकार रहता  है। मार्केट सर्वे से पता चलता है कि चांदी के वर्क की खपत बढ़ गई है और अब यह माल देहातों में भी इस्तेमाल में आने लगा है। 
ठक…. ठक…. ठक। घड़ी की सुई जैसी नियमितता से हथौड़ी गिरती है और करीब डेढ़ घंटे में 150 वर्क तैयार।  





(यह नक्शा मामाजी ने अपने हाथ से बना कर 1973 में दिया था जब मैं मेरठ से लखनऊ एल आई सी 
की एक परीक्षा देने आया था और उनके पास यूनिवर्सिटी कैंपस स्थित 78 बादशाह बाग कालोनी आया था ------ विजय राजबली माथुर )




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